क्या आप एक इन्शान है ? पढ़े और सोचे !

*क्या आप एक सच्चा इन्शान है?*
इन्शान के दिमाग में कई प्रकार के विचार हमेसा चलते रहता है।इन्शान अपने बारे में उतना ज्यादा नही सोचता है जितना वह दूसरों के बारे में सोचता है।क्या आपने कभी गौर किया है?जब आप अपने दोस्त के साथ रहते हैं तो आप दोनों के चर्चा का विषय आप दोनों नही रहते हैं बल्कि कोई तीसरा इन्शान ही या अन्य कोई वस्तु ही रहती है।दूसरे के दुख से हम आकर्षित और खुश होते है जबकि दूसरे के सुख से अशांत और दुखी होते हैं,इसमे इन्शान की गलती नही है क्योंकि इन्शान का स्वभाव ही ऐसा होता है।लेकिन यह न तो इन्शानियत है और न ही पशुता क्योंकि जानवर भी दूसरे जानवर के दुख से दुखी रहते हैं लेकिन साधारण इन्शान ऐसा नही कर पाता है।
               यदि हम दूसरे के दुख में दुखी होते हैं और दूसरे के सुख में सुख का अनुभव करते हैं तो हम सच्चा इन्शान हैं।इसके उल्टा यदि हम किसी दूसरे के सुख पर दुखी होते हैं ,उससे जलन करते हैं और यह सोचते हैं कि जो सुख उसे प्राप्त है वह मुझे मिल जाय तो भी हम दुख के ही भागीदार है।
                 एक मशहूर कथा है ,दो अच्छे मित्र थे।उनमें एक अंधा था और दूसरा लंगड़ा ।चुकी एक देख नही सकता था और दूसरा चल नही सकता था,इसलिये दोनों एक दूसरे की सहायता से भीख मांगते और अपने जीवन का गुजारा करते।दोनों में कई बार झगड़ा भी होता लेकिन एक दूसरे की जरूरत के कारण झगड़ा शांत हो जाता।एक दिन उन दोनों के बीच विवाद काभी ज्यादा बढ़ गया और उन दोनों ने एक दूसरे की खूब पिटाई कर दी।भगवान ने सोचा कि अगर अंधे को आंख और लंगड़े को पैर दे दिया जाए तो वे दोनों सुख एवं शांतिपूर्वक रहेंगे।भगवान ने अंधे के सामने प्रकट हुए और बोले कि कोई एक वर मांगो।इस पर अंधे ने कहा कि "मेरे लंगड़े मित्र को अंधा कर दो"।फिर भगवान ने लंगड़े के पास पहुचा "तो उसने कहा कि मेरे अंधे मित्र को लंगड़ा कर दो "भगवान ने कहा तथास्तु और अंधा लंगड़ा हो गया तथा लंगड़ा अंधा हो गया ।ये दोनों तो पहले से ही दुखी थे और एक दूसरे के लिये दुख मांगकर और दुखी हो गये।चाहिये था कि अंधा अपने लिये आंख मांगता और लंगड़ा अपने लिये पैर मांगता बल्कि वे दोनों ने ऐसा नही किया और वे ज्यादा दुख का भागीदार बन गये।
                 वास्तव में इन्शान एक दूसरे से घृणा ,नफरत,बैर करने में ही सारा जीवन बिता देता है,जबकि इन्शान को चाहिये कि प्रेम,प्यार,शांति से रहकर जीवन को सफल बनायें।
                  यह पूरी तरह से सत्य है कि इन्शान को अपना दुख ज्यादा लगता है जबकि सुख कम और इन्ही स्वभाव के कारण इन्शान दुख भोगता है।इन्शान अपने वास्तविक सुख को वस्तुयों में तलासने की कोशिश करता है जबकि वास्तविक खुशी इन्शान को अपने आप से मिलती है।
                  इन्शान के दुख का सबसे बड़ा कारण यह है कि वह अपनी तुलना अपने से धनी व्यक्तियों के साथ करता है।वह उन लोगो को नही देखता है जो अपनी पूरी जिंदगी झोपड़ियों में गुजार देते हैं।इन्शान के इच्छाओं की पूर्ति कभी नही होती है,जैसे अगर आपके पास साइकिल है तो आपको मोटरसाइकिल की इच्छा होगी,मोटरसायकिल होने पर कार की इच्छा होगी और कार होने पर हेलीकाप्टर की इच्छा होगी।इस प्रकार पूरी जीवन मे भी इन्शान के इच्छाओं की पूर्ति नही हो पाती है और वह अशांत तथा दुखी रहता है।
                   अगर आप सुख खोज रहे हैं तो आप दुख खोजना शुरू कर दीजिये ,कभी कभी अस्पताल में जाइये,अपाहिजों को देखिये,भिखमंगो के बारे में सोचिये,भूखे पेट सोने वाले इन्शान से मिलिये, तब आप महशुश करेंगे कि जो भी आपके पास है काभी है और आप बहूत ही ज्यादा खुशहाल हैं।शायद उन्हें देखकर आपके दिल में उन्हें सेवा करने की भावना जाग जाय।
                  @  *अपने दुख को तो जानवर भी महसूस करते हैं लेकिन सच्चा इन्शान वही है जो दूसरे के दुख को महसूस करता है*@
                     धीरज वाणी

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