अगर आपको जीवन में सफलता एवं शांति चाहिये तो इसे जरूर पढ़ें

*अगर आप चाहते हैं जीवन में शांति और सफलता तो इसे भी जान लें*
इस दुनियां में प्रत्येक इन्शान को अपना जीवन चलाने के लिये किसी न किसी काम की आवश्यकता जरूर पड़ती है।गीता में भी कहा गया है"कर्म के बिना जीवन संभव नही है"/काम के द्वारा जीवन चलाने वाले इन्शान को ही पुरुषार्थी कहा जाता है,लेकिन पुरुषार्थ अधूरा नही पूरा होना चाहिये।
                 अपने जीवन को चलाने के लिये इन्शान या तो स्वयं का कोई रोजगार करता है अथवा नौकरी।इन दोनों ही स्थितियों में यदि वह अपने आप को स्वतंत्र मानकर काम करता है तो उसके काम में गुणवत्ता भी होगी और उसके दिल में संतोष भी।लेकिन इन्शान अगर समझता है कि वह दास की तरह नौकरी कर रहा है या अपने व्यवशाय की देखभाल कर रहा है तो न ही वह सही से काम कर पायेगा और न ही उसके दिल में कभी संतोष पैदा होगी।शांति का अनुभव करने के लिये इन्शान को चाहिये कि वह खुद का मालिक बनें और अपने काम को भी पसन्द करें ।यदि आपको सोना पसंद है और आपको सोने की बेड़ियों से जकड़ दिया जाए और आपको एक सोने से बनी जेल में डाल दिया जाए तो क्या आप उस सोना को पसन्द करेंगे?बिल्कुल नही करेंगे।
                  इन्शान को शांति एवं सफलता प्राप्त करने के लिये काम तो लगातार करते रहना चाहिये,लेकिन कभी अपने आप को बंधन में नही डालना चाहिये।हमें एक मालिक की तरह काम करना चाहिये न कि दास की तरह।हमें काम लगातार करते रहना चाहिये लेकिन कभी गुलाम की तरह काम नही करना चाहिये।लगभग 99 प्रतिशत लोग दासों की तरह काम करते हैं और उसका परिणाम होता है दुख।हमें किसी काम को सच्चे दिल और प्रेम से काम करनी चाहिये।
                 प्रेम शब्द का अर्थ समझना बहूत ही कठिन है,बिना आजादी के कभी सच्चा प्रेम आ ही नही सकता।यदि आप एक गुलाम खरीद लेते हैं और उससे अपने लिये काम करवाते हैं तो वह कष्ट उठाकर आपका काम तो कर देगा लेकिन उसके दिल में आपके लिये कभी प्रेम नही हो सकता।इसी प्रकार जब हम किसी काम को दास की तरह करते हैं तो वंहा प्रेम नही होता है और जिस काम को सच्चे दिल से नही किया जाए वह काम कभी पूरा हो ही नही सकता।
                 अगर आप चाहते हैं कि आपको शांति एवं सफलता हासिल हो तो प्रत्येक काम को सच्चे दिल से प्रेमपूर्वक करना सीखें।प्रेम के साथ किया गया हर काम शांतिपूर्ण एवं आनंददायक होती है।।।
                   धीरज वाणी

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